‘गम कोई देना है, तो दे दे मुझे… दिल में रख लूंगा निशानी की तरह’, ‘जेब में कलम रखने से शायर नहीं बनोगे… कलम ज़ख्मों पर रखनी पड़ती है’, ‘ये जो ज़मीर है न… कांपता जरूर है, कभी गुनाह से पहले, कभी गुनाह के बाद',

ਮਨੋਰੰਜਨ Fri, 28 Nov 2025 01:59 PM


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‘गम कोई देना है, तो दे दे मुझे… दिल में रख लूंगा निशानी की तरह’, ‘जेब में कलम रखने से शायर नहीं बनोगे… कलम ज़ख्मों पर रखनी पड़ती है’, ‘ये जो ज़मीर है न… कांपता जरूर है, कभी गुनाह से पहले, कभी गुनाह के बाद', ऐसी शायराना रूह वाली पंक्तियां बहुत समय बाद किसी फिल्म में सुनाई दी हैं। मोहब्बत, फ़र्ज़ और ज़मीर के गहरे अहसासों से लिपटी फिल्म ‘गुस्ताख़ इश्क़’ इन अशआर और डायलॉग्ज को सिर्फ सुनाती नहीं, बल्कि उन्हें जीती है। जैसा कि निर्देशक विभु पुरी की टैगलाइन कहती है, 'कुछ पहले जैसा', यह फिल्म सचमुच आज के सिचुएशनशिप, ओपन रिलेशनशिप, जॉम्बीइंग, नैनो-शिप और बेन्चिंग वाले इंस्टेंट लव के दौर से पहले की, उस खालिस इश्क की दास्तान है, जहां महबूब की महज एक झलक ही दिल की धड़कनों को बेकाबू कर देने के लिए काफी होती थी।नफ़ासत, नज़ाकत और सूफ़ियाना ढब की यह फ़िल्म शायराना रूमानियत का जश्न मनाती है।
'गुस्ताख इश्क' की कहानी
कहानी का बैकड्रॉप है पुरानी दिल्ली, और दौर है नब्बे का, जब मोबाइल और सोशल मीडिया ने ज़िंदगी की रफ़्तार नहीं छीनी थी। नवाबुद्दीन सैफ़ुद्दीन रहमान (विजय वर्मा) अपनी बूढ़ी मां और छोटे भाई के साथ तंगहाली में जी रहा है। पिता की आखिरी निशानी, उर्दू प्रिंटिंग प्रेस, बिकने के कगार पर है। छोटा भाई गरीबी से निकलने के लिए प्रेस बेच देना चाहता है, लेकिन नवाबुद्दीन इसे अपनी विरासत समझकर किसी भी कीमत पर बचाना चाहता है। इसी जद्दोजहद में वह पंजाब के मलेरकोटला पहुँचता है—एक ऐसा शहर जहां उर्दू की तहज़ीब अब भी सांस लेती है। यहाँ रहता है कभी नामचीन मगर अब गुमनाम हो चुके शायर अज़ीज़ (नसीरुद्दीन शाह)। नवाबुद्दीन उनका शागिर्द बनने का दिखावा इसलिए करता है कि उनके अशआर छापकर वह अपनी प्रेस को बचा सके। लेकिन इस दुनिया में कदम रखते ही उसकी मुलाक़ात होती है अज़ीज़ की बेटी, मिनी (फ़ातिमा सना शेख़) से—एक ऐसी लड़की जिसका तल्ख अतीत उसकी मुस्कान तक छीन चुका है। धीरे-धीरे नवाबुद्दीन उससे मोहब्बत करने लगता है। कहानी तब दिलचस्प मोड़ लेती है जब नवाबुद्दीन को पता चलता है कि उसके पिता और अज़ीज़ के बीच कभी गहरा रिश्ता था, जिसका राज आज तक किसी को नहीं पता था। वह अज़ीज़ को मनाने की पूरी कोशिश करता है कि वे अपनी शायरी उसे छापने दें, मगर अज़ीज़ के सारे कलाम उस मोहब्बत को समर्पित हैं जिसे उन्होंने कब का अलविदा कह दिया है। आगे यह सफ़र किस अंजाम तक पहुंचता है, https://youtu.be/_IKrJZpkLgk

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