मजाज़ लखनवी: 'मजाज़ की किताब को लड़कियां तकिए में छिपा कर रखतीं थीं'

ਮਨੋਰੰਜਨ Sat, 19 Jul 2025 08:28 AM


मजाज़ लखनवी: 'मजाज़ की किताब को लड़कियां तकिए में छिपा कर रखतीं थीं'
उर्दू शायरी ने वह दौर भी देखा है जब शायर इश्क़ की दुनियां में सपनों के राजकुमार की सी हैसियत रखते थे। नौजवान लड़कियां शायरों के चित्र अपने सिरहाने रखती थीं और दीवान अपने सीने से लगाए फिरती थीं। शायरी का यह दौर लाने वालों में सबसे पहला और प्रमुख नाम असरार-उल-हक़ मजाज़ का आता है। 

मशहूर अफ़साना निगार इस्मत चुगताई ने अपनी आत्मकथा 'कागज़ है पैरहन' में लिखा है, "मजाज़ का काव्य संग्रह आहंग जब प्रकाशित हुआ तो गर्ल्स कॉलेज की लड़कियां इसे अपने सिरहाने तकिए में छिपा कर रखतीं और आपस में बैठकर पर्चियां निकालतीं कि हम में से किसको मजाज़ अपनी दुल्हन बनाएगा।" आख़िर मजाज़ की शायरी में ऐसा क्या था जिसने अपने दौर को इतना महत्वपूर्ण बनाया और अपनी शख़्सियत को और बुलंद बनाया। हालांकि मजाज़ जिस दौर में शायरी कर रहे थे वह तक़्क़ीपसंद शायरी का युग था और तमाम तरक़्क़ी पसंदों की तरह मजाज़ की शायरी में भी इश्क़ और क्रांति एक दूसरे में घुल मिल गए थे। लेकिन सिर्फ़ यही उनकी का रंग नहीं था। कुछ तो था जो मजाज़ का बिल्कुल अपना था और बहुत गहरे रूमान का था। 

इधर दिल में इक शोर-ए-महशर बपा था 
मगर उस तरफ़ रंग ही दूसरा था 

हँसी और हँसी इस तरह खिलखिला कर 
कि शम-ए-हया रह गई झिलमिला कर 
नहीं जानती है मेरा नाम तक वो 
मगर भेज देती है पैग़ाम तक वो 

ये पैग़ाम आते ही रहते हैं अक्सर 
कि किस रोज़ आओगे बीमार हो कर 


यह नज़्म मजाज़ ने अस्पताल की एक नर्स को नज़र करके लिखी थी। जब एक अनाम सी नर्स के प्रति ऐसा रूमानी ख़्याल रहा हो तो मजाज़ के रोमेंटिसिज़्म का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है।
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